ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट: 83% काम पूरा, जानिए कब चलेगी पहली ट्रेन और क्या है 16 सुरंगों व 19 पुलों का सच
उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में बन रहा 125.2 किलोमीटर लंबा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल प्रोजेक्ट अब अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है, जिसका लगभग 80 से 83 प्रतिशत ओवरऑल काम और 97 प्रतिशत टनल खुदाई पूरी हो चुकी है। इस प्रोजेक्ट के पूरा होते ही ऋषिकेश से कर्णप्रयाग का 7 से 8 घंटे का कठिन पहाड़ी सफर घटकर मात्र 2 से 2.5 घंटे का रह जाएगा। पूरे रूट का 83 प्रतिशत हिस्सा (करीब 104 किमी) 16 मुख्य सुरंगों के अंदर से गुजरेगा, जिसे जोड़ने के लिए 19 बड़े पुल (16 मुख्य रेल ट्रैक ब्रिज और 3 स्टेशन अप्रोच नदी ब्रिज) बनाए जा रहे हैं। रेलवे की योजना के अनुसार, पहले प्रायोरिटी सेक्शन यानी योगनगरी ऋषिकेश से ब्यासी के बीच जून 2028 तक पहली ट्रेन चलाने का लक्ष्य है, जबकि दिसंबर 2029 तक पूरे 125.2 किमी के रूट को चालू कर दिया जाएगा।
➤ हिमालय के सीने में बन रहा इंजीनियरिंग का सबसे बड़ा अजूबा:
उत्तराखंड के पहाड़ों में ट्रेन चलाने का सपना अब हकीकत के बेहद करीब पहुँच चुका है। 125.2 किलोमीटर लंबा ऋषिकेश-कर्णप्रयाग ब्रॉड-गेज रेल प्रोजेक्ट सिर्फ एक रेलवे लाइन नहीं, बल्कि हिमालय की जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों को मात देने वाला एक ऐतिहासिक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट है। यह रेल लाइन उत्तराखंड के 5 जिलों - देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली को सीधे देश के रेल नेटवर्क से जोड़ेगी।
इस पूरे प्रोजेक्ट की सबसे बड़ी खासियत इसका 'टनल-ब्रिज-टनल' (Tunnel-Bridge-Tunnel) मॉडल है। यानी ट्रेन एक पहाड़ की सुरंग से बाहर निकलेगी, नदी या गहरी घाटी पर बने पुल को पार करेगी और तुरंत अगले पहाड़ की सुरंग में प्रवेश कर जाएगी। कुल 125.2 किमी के रूट में से 83 प्रतिशत हिस्सा (लगभग 104 किमी) जमीन के अंदर सुरंगों से होकर गुजरता है।
➤ कौन-कौन से हैं 12 स्टेशन और क्या है रूट:
वीरभद्र स्टेशन से आगे बढ़ने पर इस रूट पर कुल 12 मुख्य स्टेशन बनाए जा रहे हैं:योगनगरी ऋषिकेश,शिवपुरी,ब्यासी ,देवप्रयाग,जनासू ,मलेथा ,श्रीनगर (गढ़वाल),धारी देवी ,तिलानी (रुद्रप्रयाग) ,घोलतीर,गौचर,कर्णप्रयाग (सेवाई)।
रेल मंत्रालय के नवीनतम अपडेट के अनुसार, 16 मुख्य सुरंगों (104 किमी) में से 101 किमी से ज्यादा की खुदाई पूरी हो चुकी है। इसके साथ ही सुरक्षा के लिए बनाई जा रही 12 समानांतर एस्केप टनल (98 किमी) में से 95 किमी से अधिक का काम पूरा हो चुका है। देवप्रयाग और जनासू के बीच बनी देश की सबसे लंबी रेल ट्रांसपोर्ट सुरंग टनल-8 (14.5 किमी) समेत ज्यादातर सुरंगों का ब्रेकथ्रू हो चुका है। अब मुख्य फोकस सिर्फ दो सबसे चुनौतीपूर्ण सुरंगों—T1 और T5 के अंतिम हिस्से पर है।
➤ TBM मशीनों में बदलाव और T1 व T5 सुरंगों की जटिलता:
आम तौर पर पहाड़ों में सुरंग खोदने पर पक्की ग्रेनाइट चट्टानें मिलती हैं, लेकिन हिमालय 'यंग फोल्ड माउंटेन्स' (नवीन पर्वत) हैं। यहाँ खुदाई करने पर सख्त चट्टान के बजाय नरम मिट्टी, भुरभुजे पत्थर और ह्यूमस (Soft Strata) निकलता है। इस नरम परत की वजह से पहाड़ का दबाव सुरंग को अंदर की ओर दबाता है, जिसे इंजीनियरिंग भाषा में 'Squeezing Tendency' (सुरंग का सिकुड़ना) कहा जाता है।
इस समस्या से निपटने के लिए वैज्ञानिक मॉडलिंग के बाद टनल बोरिंग मशीन (TBM शिव और शक्ति) में तीन बड़े बदलाव किए गए—मशीन के कटर हेड को बदला गया, पीछे की सुरक्षा शील्ड और प्लेट असेंबली को मजबूत किया गया, और मशीन के ड्राइव सिस्टम में एक्स्ट्रा टॉर्क व एक्स्ट्रा थ्रस्ट जोड़ा गया ताकि पहाड़ के दबाव के बावजूद मशीन न रुके।
▶ Tunnel-1 (T1 — ऋषिकेश से शिवपुरी, 10.85 किमी) क्यों है सबसे कठिन?
योगनगरी ऋषिकेश के बाद चंद्रभागा नदी (ब्रिज B01) को पार करते ही ढालवाला से यह सुरंग शुरू होती है और घुघतियानी तल्ली व जमारी काटल के पहाड़ों के नीचे से होते हुए शिवपुरी तक जाती है। यह इलाका हिमालय के सबसे नाजुक 'मेन बाउंड्री थ्रस्ट' (MBT) जोन में आता है। यहाँ पहाड़ के अंदर से तेज रफ्तार में पानी का फव्वारा (Heavy Water Ingress) फूटता है और ठीक ऊपर घनी आबादी व गाँव बसे हैं। ऊपर के घरों और जमीन को धंसने से बचाने के लिए माइक्रो-पाइल्स (Micro-piles) और केमिकल ग्राउटिंग से पहाड़ को ठोस करके खुदाई की जा रही है। इसकी 10.847 किमी लंबी समानांतर एस्केप टनल 100% पूरी हो चुकी है, और मुख्य टनल की भी 94% से अधिक खुदाई पूरी होकर केवल अंतिम कुछ सौ मीटर का काम बाकी है।
▶ Tunnel-5 (T5 — ब्यासी से देवप्रयाग, 9.76 किमी) की चुनौती क्या है?
ब्यासी और देवप्रयाग के बीच 4 सुरंगें (T4, T5, T6, T7) हैं, जिनमें T4, T6 और T7 पूरी हो चुकी हैं। कौड़ियाला और तीन धारा के पहाड़ के नीचे बन रही T5 गंगा नदी की बेहद खड़ी घाटी और सीस्मिक जोन-V के फॉल्ट जोन से गुजरती है। यहाँ सुरंग का पोर्टल सीधे गहरी खाई में विशाल ब्रिज B06 से जुड़ता है और ठीक ऊपर बद्रीनाथ नेशनल हाईवे (NH-7) का लाइव ट्रैफिक चलता है। इस सुरंग की भी 70% से अधिक खुदाई पूरी हो चुकी है और कंक्रीट लाइनिंग का काम तेजी से जारी है।
➤ 16 बनाम 19 ब्रिज का पूरा सच: कहाँ बन रहे हैं ये सारे पुल?
अक्सर लोगों के मन में सवाल आता है कि जब मुख्य रेल ट्रैक पर B01 से लेकर B16 तक 16 रेल ब्रिज ही हैं, तो कुल बड़े पुलों की संख्या 19 क्यों बताई जाती है? और आधिकारिक मैप पर सिर्फ 5 ब्रिज (B01, B06, B08, B09, B15) ही क्यों दिखते हैं?
दरअसल, मैप को साफ रखने के लिए उस पर केवल मुख्य नदियों को पार करने वाले 5 सबसे बड़े लैंडमार्क ब्रिज ही दर्शाए गए हैं, जबकि पूरे 19 पुलों का असली गणित 16 + 3 = 19 है:
1. मुख्य ट्रैक के 16 रेल ब्रिज (B01 से B16):
B01 (ऋषिकेश): चंद्रभागा नदी पर 314.4 मीटर लंबा पहला ब्रिज (पूर्ण)।
B02 और B03 (शिवपुरी–ब्यासी): टनल T2 और T3 के बीच गुल्लर घाटी पर बने 2 ब्रिज (पूर्ण)।
B04, B05 और B07 (ब्यासी–देवप्रयाग): पहाड़ी गदेरों और खाइयों पर बने 3 ब्रिज (पूर्ण)।
B06 (देवप्रयाग): टनल T5 के ठीक बाद गंगा घाटी पर बन रहा विशाल स्टील ट्रस ब्रिज (निर्माणाधीन)।
B08 (जनासू–मलेथा): अलकनंदा नदी पर 40 मीटर ऊँचे पिलर वाला ब्रिज (पूर्ण)।
B09 (श्रीनगर): श्रीनगर से धारी देवी के बीच अलकनंदा नदी पर बना प्रोजेक्ट का सबसे लंबा (500 मीटर) ब्रिज (पूर्ण)।
B10 और B11 (धारी देवी): धारी देवी स्टेशन के दोनों छोर पर बने धारी-इन और धारी-आउट ब्रिज (अंतिम चरण में)।
B12 (नरकोटा): टनल T12 और T13 के बीच नरकोटा खड्ड पर बना ब्रिज (निर्माणाधीन)।
B13 और B14 (तिलानी–घोलतीर): तिलानी-आउट और घोलतीर-इन ब्रिज (निर्माणाधीन)।
B15 (गौचर): गौचर स्टेशन के बाद रानो गाँव के पास अलकनंदा नदी पर बन रहा प्रोजेक्ट का सबसे ऊँचा (46.9 मीटर) रेल ब्रिज (निर्माणाधीन)।
B16 (कर्णप्रयाग/सेवाई): टनल T16 से निकलते ही सेवाई स्टेशन यार्ड से पहले सिवाई नाला पर बना आखिरी मेन-लाइन रेल ब्रिज (निर्माणाधीन)।
2. बाकी के 3 बड़े स्टेशन अप्रोच ब्रिज (16 + 3 = 19):
चूँकि श्रीनगर/लछमोली, गौचर और कर्णप्रयाग (सेवाई) के रेलवे स्टेशन अलकनंदा नदी के दूसरे किनारे पर बने हैं और बद्रीनाथ नेशनल हाईवे (NH-7) इस किनारे पर है, इसलिए यात्रियों और गाड़ियों को हाईवे से सीधे स्टेशन तक पहुँचाने के लिए अलकनंदा नदी पर 3 बड़े स्टेशन कनेक्टिविटी/मोटर ब्रिज बनाए गए हैं (जैसे कर्णप्रयाग के सेवाई-कालेश्वर में 125 मीटर लंबा बो-स्ट्रिंग आर्च ब्रिज और गौचर का 110 मीटर लंबा ओपन वेब गर्डर ब्रिज)। कुल 19 प्रमुख पुलों में से 11 पूरे हो चुके हैं और बाकी 8 पर काम अंतिम चरण में है।
➤ कब चलेगी पहली ट्रेन और क्यों है यह देश के लिए इतना खास?
पहला चरण (जून 2028): योगनगरी ऋषिकेश से शिवपुरी और ब्यासी तक के शुरुआती प्रायोरिटी सेक्शन को जून 2028 तक चालू करके पहली ट्रेन दौड़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
पूरा प्रोजेक्ट (दिसंबर 2029): पूरे 125.2 किमी के ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रूट पर दिसंबर 2029 तक ट्रेन संचालन शुरू करने का लक्ष्य है।
तीर्थयात्रा और चीन सीमा की सुरक्षा: इस रेल लाइन के शुरू होने से केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम जाने वाले श्रद्धालुओं को लैंडस्लाइड और घंटों के ट्रैफिक जाम से मुक्ति मिलेगी। साथ ही, इसका अंतिम स्टेशन कर्णप्रयाग भारत-चीन सीमा से मात्र 123 किलोमीटर दूर है, जिससे भारतीय सेना और बॉर्डर लॉजिस्टिक्स को हर मौसम में तेज़ और सुरक्षित कनेक्टिविटी मिलेगी।
वीडियो में देखें 3D मैप और ग्राउंड विजुअल्स के साथ पूरा विश्लेषण 👉